कंप्यूटर का आविष्कार किसने किया? चार्ल्स बैबेज की संघर्ष भरी कहानी (Computer History in Hindi)

 (Introduction)

दोस्तों, आज आप और मैं जिस स्क्रीन पर यह आर्टिकल पढ़ रहे हैं, या जिस मोबाइल में आप रील्स और वीडियो देखते हैं, क्या आपने कभी सोचा है कि इसकी शुरुआत कहाँ से हुई थी?

आज के ज़माने में कंप्यूटर इतना छोटा हो गया है कि हमारी हथेली में समा जाता है (स्मार्टफोन), लेकिन एक वक़्त ऐसा था जब ‘कंप्यूटर’ किसी मशीन का नाम नहीं, बल्कि इंसानों का नाम हुआ करता था। जी हाँ, आपने सही पढ़ा! 200 साल पहले जो लोग गणित का हिसाब-किताब करते थे, उन्हें ‘Computer’ कहा जाता था।

लेकिन, इंसानों से गलती होती थी। और उसी गलती को सुधारने की ज़िद ने एक ऐसे मशीन को जन्म दिया, जिसने पूरी दुनिया का नक्शा बदल दिया। उस ज़िद्दी इंसान का नाम था— चार्ल्स बैबेज (Charles Babbage)

आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे कि कंप्यूटर का आविष्कार असल में कैसे हुआ? चार्ल्स बैबेज कौन थे? और क्यों उन्हें ‘फादर ऑफ़ कंप्यूटर’ (Father of Computer) कहा जाता है, जबकि उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी बिजली वाला कंप्यूटर देखा ही नहीं था?

यह कहानी सिर्फ़ विज्ञान की नहीं, बल्कि एक अधूरे सपने और कभी न हार मानने वाले जज़्बे की है। तो चलिए, इतिहास के पन्नों को पलटते हैं।


चार्ल्स बैबेज: एक शरारती और जिज्ञासु बच्चा (Early Life)

कहानी शुरू होती है आज से लगभग 230 साल पहले। 26 दिसंबर 1791 को लंदन (इंग्लैंड) में एक अमीर बैंकर के घर एक बच्चे का जन्म हुआ, जिसका नाम रखा गया—चार्ल्स बैबेज।

बचपन में चार्ल्स बहुत बीमार रहते थे। उन्हें अक्सर तेज़ बुखार आता था, इसलिए उन्हें स्कूल जाने की बजाय घर पर ही शिक्षकों (tutors) द्वारा पढ़ाया जाता था। लेकिन बीमारी ने उनके दिमाग की रफ़्तार को कम नहीं किया। वे बचपन से ही बेहद जिज्ञासु (Curious) थे।

कहा जाता है कि जब भी चार्ल्स को कोई नया खिलौना मिलता, तो वे उसे खेलने के बजाय उसे तोड़ देते थे। क्यों? क्योंकि वो यह जानना चाहते थे कि खिलौने के अंदर क्या है और वो काम कैसे करता है। यही “जानने की भूख” आगे चलकर कंप्यूटर के आविष्कार की नींव बनी।

वे गणित (Mathematics) से बहुत प्यार करते थे। जब वे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए, तो उन्हें एहसास हुआ कि वे अपने प्रोफेसर्स से भी ज्यादा गणित जानते हैं। यहीं से उनके मन में गणनाओं (Calculations) को लेकर एक अलग सोच पैदा होने लगी।


वह एक विचार जिसने दुनिया बदल दी (The Spark)

यह बात है सन 1812 की। चार्ल्स बैबेज अपने कुछ दोस्तों के साथ ‘एनालिटिकल सोसाइटी’ के कमरे में बैठे थे। उनके सामने मेज़ पर लॉग टेबल (Logarithm Tables) की मोटी-मोटी किताबें खुली पड़ी थीं।

उस ज़माने में इंजीनियरों, खगोलविदों (Astronomers) और नाविकों (Sailors) के लिए गणित की ये किताबें ही सबकुछ थीं। इन किताबों में लिखी संख्याओं के आधार पर ही पानी के जहाज़ अपना रास्ता तय करते थे और पुल बनाए जाते थे।

लेकिन समस्या यह थी कि ये टेबल हाथ से लिखे जाते थे (Human Computers द्वारा)। और इंसान गलती करता है। जब चार्ल्स उन टेबल्स को चेक कर रहे थे, तो उन्हें ढेर सारी गलतियां मिलीं।

गुस्से और हताशा में उन्होंने अपना सिर पकड़ लिया और चिल्लाकर कहा:

“हे भगवान! काश ये गणनाएं भाप (Steam) से चलनी वाली मशीन से की जा सकतीं!”

(Original quote: “I wish to God these calculations had been executed by steam.”)

यही वह पल था, जब कंप्यूटर के आविष्कार का बीज बोया गया। चार्ल्स ने सोचा—अगर मशीन कपड़ा बुन सकती है (उस समय मिलें चल रही थीं), तो मशीन गणित का हिसाब क्यों नहीं लगा सकती? मशीन थकेगी नहीं, मशीन बोर नहीं होगी और मशीन गलती नहीं करेगी।


पहला प्रयास: डिफरेंस इंजन (The Difference Engine)

अपनी इस सोच को हकीकत बनाने के लिए बैबेज ने काम शुरू किया। 1822 में, उन्होंने एक छोटी मशीन का डिज़ाइन तैयार किया और उसे नाम दिया— “डिफरेंस इंजन” (Difference Engine)

यह मशीन बहुपद (Polynomial) समीकरणों को हल करने के लिए बनाई गई थी। जब उन्होंने ब्रिटिश सरकार को अपना आईडिया सुनाया, तो सरकार बहुत खुश हुई। सरकार को लगा कि अगर यह मशीन बन गई, तो उनके जहाज़ समुद्र में रास्ता नहीं भटकेंगे और युद्ध में तोपों का निशाना सटीक लगेगा।

सरकार ने बैबेज को उस ज़माने में £1,700 (जो आज के करोड़ों रुपयों के बराबर है) की फंडिंग दी।

बैबेज ने काम शुरू किया। उन्होंने धातु के पहिये, गियर और शाफ़्ट बनवाना शुरू किया। लेकिन यह काम आसान नहीं था। उस समय आज जैसी लेथ मशीनें (Lathe Machines) और टूल्स नहीं थे। हर पुर्जा हाथ से बनाना पड़ता था और अगर एक पुर्जा भी 1 मिलीमीटर छोटा-बड़ा हुआ, तो पूरी मशीन जाम हो जाती थी।

सालों बीत गए। पैसा पानी की तरह बह गया। बैबेज का स्वभाव भी थोड़ा चिड़चिड़ा था। वे अपने कारीगरों से झगड़ पड़ते थे और बार-बार डिज़ाइन बदलते रहते थे। करीब 10 साल की मेहनत और सरकार के ढेर सारे पैसे खर्च करने के बाद भी, ‘डिफरेंस इंजन’ पूरा नहीं बन पाया। 1833 में सरकार ने हाथ खड़े कर दिए और फंडिंग रोक दी।

ज्यादातर लोग यहाँ हार मान लेते, लेकिन चार्ल्स बैबेज ‘ज्यादातर लोगों’ में से नहीं थे। उनके दिमाग में एक और भी बड़ा तूफ़ान चल रहा था।


असली कंप्यूटर का जन्म: एनालिटिकल इंजन (The Analytical Engine)

जब डिफरेंस इंजन का काम रुका, तो बैबेज ने एक जनरल पर्पस मशीन (General Purpose Machine) के बारे में सोचना शुरू किया। एक ऐसी मशीन जो सिर्फ़ एक तरह का गणित नहीं, बल्कि किसी भी तरह का काम कर सके।

1837 में उन्होंने दुनिया के सामने “एनालिटिकल इंजन” (Analytical Engine) का डिज़ाइन रखा।

दोस्तों, इसे ध्यान से समझियेगा, क्योंकि यही वह डिज़ाइन है जो आज के हमारे मॉडर्न कंप्यूटर का पूर्वज (Ancestor) है।

बैबेज के एनालिटिकल इंजन में चार मुख्य हिस्से थे, जो बिल्कुल आज के कंप्यूटर जैसे थे:

  1. द मिल (The Mill): यह गणना (Calculation) करने वाला हिस्सा था। आज की भाषा में इसे हम CPU (प्रोसेसर) कहते हैं।

  2. द स्टोर (The Store): यह जानकारी को जमा रखने की जगह थी। आज इसे हम Memory (RAM/Hard Disk) कहते हैं।

  3. द रीडर (The Reader – Input): डेटा अंदर डालने का तरीका। इसके लिए बैबेज ने पंच कार्ड (Punch Cards) का इस्तेमाल करने की योजना बनाई। (यह आईडिया उन्होंने कपड़ा बुनने वाली जैकर्ड लूम मशीन से लिया था)।

  4. द प्रिंटर (The Printer – Output): नतीजा दिखाने के लिए मशीन।

जरा सोचिये! 1837 में, जब बिजली का बल्ब भी नहीं बना था, तब एक इंसान ने CPU और मेमोरी वाली मशीन का पूरा नक्शा (Blueprints) तैयार कर लिया था। इसीलिए चार्ल्स बैबेज को ‘कंप्यूटर का जनक’ कहा जाता है।


दुनिया की पहली प्रोग्रामर: लेडी एडा लवलेस (Ada Lovelace)

बैबेज की कहानी में एक और किरदार का ज़िक्र करना बहुत ज़रूरी है, जिसके बिना यह इतिहास अधूरा है। वह थीं— लेडी एडा लवलेस (प्रसिद्ध कवि लॉर्ड बायरन की बेटी)।

जहाँ दुनिया बैबेज की मशीन को सिर्फ़ एक ‘बड़ा कैलकुलेटर’ समझ रही थी, वहीं एडा लवलेस ने उस मशीन की असली ताकत को पहचाना।

एडा ने समझा कि यह मशीन सिर्फ़ नंबरों को नहीं जोड़ रही, बल्कि यह किसी भी तरह के डेटा (Data) को प्रोसेस कर सकती है—चाहे वो म्यूजिक हो, लेटर्स हों या आर्ट हो। एडा ने एनालिटिकल इंजन के लिए गणना करने का एक तरीका (Algorithm) लिखा।

इतिहास में इसे ही दुनिया का पहला कंप्यूटर प्रोग्राम माना जाता है और एडा लवलेस को दुनिया की पहली प्रोग्रामर


एक दुखद अंत (The Tragic End)

यह कहानी का सबसे दुखद हिस्सा है। चार्ल्स बैबेज अपने समय से बहुत आगे थे—शायद 100 साल आगे।

उस ज़माने की टेक्नोलॉजी इतनी विकसित नहीं थी कि बैबेज के जटिल (Complex) डिज़ाइन के हिसाब से बारीक पुर्जे बना सके। एनालिटिकल इंजन का आकार एक रेलगाड़ी के इंजन जितना बड़ा होने वाला था और वह भाप (Steam) से चलने वाला था।

पैसे की कमी, सरकार की बेरुखी और लोगों के मज़ाक ने बैबेज को तोड़ दिया। उन्होंने अपनी पूरी दौलत और ज़िंदगी इन मशीनों में लगा दी।

18 अक्टूबर 1871 को चार्ल्स बैबेज का निधन हो गया। जब वे मरे, तो दुनिया को लगा कि एक पागल वैज्ञानिक चला गया। उनकी मशीनें अधूरी पड़ी रहीं। उनका सपना उनके साथ ही चला गया।

उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि जिस मशीन को वो ‘कबाड़’ समझ रहे हैं, उसी के सिद्धांत पर (Based on principles) 100 साल बाद पूरी मानव सभ्यता चलेगी।


इंसाफ: 150 साल बाद मिली जीत

क्या बैबेज का सपना सचमुच मर गया था? नहीं।

बैबेज की मौत के लगभग 120 साल बाद, 1991 में लंदन के ‘साइंस म्यूजियम’ ने एक प्रोजेक्ट शुरू किया। उन्होंने बैबेज के पुराने डिज़ाइन्स और नोट्स निकाले और फैसला किया कि वे ‘डिफरेंस इंजन’ को बनाकर देखेंगे कि क्या बैबेज सही थे?

इंजीनियरों ने 19वीं सदी की टेक्नोलॉजी का ही इस्तेमाल करके मशीन बनाई। जब मशीन बनकर तैयार हुई और उसका हैंडल घुमाया गया… तो उसने बिल्कुल सटीक (Perfect) गणना की!

दुनिया हैरान रह गई। चार्ल्स बैबेज पागल नहीं थे। उनका डिज़ाइन एकदम सही था। बस वो गलत सदी में पैदा हो गए थे। अगर उस समय उन्हें सही मदद मिली होती, तो शायद कंप्यूटर युग 100 साल पहले ही आ चुका होता।


कंप्यूटर का विकास: बैबेज के बाद क्या हुआ?

बैबेज के जाने के बाद भी उनकी रिसर्च ने कई वैज्ञानिकों को प्रेरित किया।

  • हर्मन होलेरिथ (Herman Hollerith): ने 1890 में पंच कार्ड मशीन बनाई, जिसने बाद में IBM कंपनी की नींव रखी।

  • एलन ट्यूरिंग (Alan Turing): ने 1930-40 के दशक में मॉडर्न कंप्यूटिंग की थ्योरी दी।

  • ENIAC (1945): यह दुनिया का पहला पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर था (बिजली से चलने वाला), जो एक कमरे जितना बड़ा था।

धीरे-धीरे ट्रांजिस्टर आए, फिर सिलिकॉन चिप्स (IC) आए, और कंप्यूटर छोटे और तेज़ होते गए। लेकिन इन सबकी जड़ में वही एक सिद्धांत था— इनपुट, प्रोसेस (Store & Mill), और आउटपुट—जो चार्ल्स बैबेज ने 1837 में दिया था।


निष्कर्ष (Conclusion)

तो दोस्तों, कंप्यूटर का आविष्कार किसी एक दिन में या किसी एक व्यक्ति ने नहीं किया। यह सदियों की मेहनत का नतीजा है। लेकिन इस इमारत की पहली ईंट रखने का श्रेय सिर्फ़ चार्ल्स बैबेज को जाता है।

उन्होंने हमें सिखाया कि मशीनों से सिर्फ़ मजदूरी नहीं, बल्कि ‘दिमागी काम’ भी कराया जा सकता है। उनकी कहानी हमें यह सीख देती है कि अगर आपका विज़न (Vision) सही है, तो भले ही दुनिया आज आपका साथ न दे, लेकिन भविष्य आपका ही होगा।

आज जब भी आप अपने लैपटॉप या मोबाइल पर क्लिक करें, तो एक पल के लिए उस ज़िद्दी वैज्ञानिक को ज़रूर याद करें, जिसने भाप से चलने वाले इंजन में डिजिटल दुनिया का सपना देखा था।


महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts for Exams/GK)

  • कंप्यूटर का जनक (Father of Computer): चार्ल्स बैबेज (Charles Babbage)

  • प्रथम प्रोग्रामर (First Programmer): लेडी एडा लवलेस (Lady Ada Lovelace)

  • बैबेज द्वारा बनाई गई मशीनें: डिफरेंस इंजन (1822) और एनालिटिकल इंजन (1837)।

  • बैबेज का जन्म: 26 दिसंबर 1791 (लंदन)।

  • आधुनिक कंप्यूटर का पूर्वज: एनालिटिकल इंजन (Analytical Engine)।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. कंप्यूटर का असली आविष्कार कब हुआ था?

Ans. वैसे तो गणना करने वाले यंत्र (जैसे अबेकस) हजारों साल पुराने हैं, लेकिन ‘प्रोग्रामेबल कंप्यूटर’ की अवधारणा (Concept) चार्ल्स बैबेज ने 1837 में अपने ‘एनालिटिकल इंजन’ के ज़रिए दी थी।

Q2. क्या चार्ल्स बैबेज ने पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर बनाया था?

Ans. नहीं, चार्ल्स बैबेज का कंप्यूटर मैकेनिकल (Mechanical) था, जो गियर और पहियों से चलता था। पहला इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर (ENIAC) 1945 के आसपास बना था।

Q3. भारत में कंप्यूटर कब आया?

Ans. भारत में पहला कंप्यूटर 1956 में कोलकाता के भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) में स्थापित किया गया था। इसका नाम HEC-2M था।

Q4. कंप्यूटर साक्षरता दिवस (Computer Literacy Day) कब मनाया जाता है?

Ans. हर साल 2 दिसंबर को।


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